प्रियंका गांधी को महासचिव बनाकर राहुल ने चला तुरुप का एक्का

  • हाशिया से एक ही झटके में चर्चा के केंद्र में आयी

  • भाजपा के लिए पूरे प्रदेश की चुनौती

  • सपा और बसपा के लिए भी नया दांव

  • सिंधिया को पश्चिमी उत्तरप्रदेश

रासबिहारी

नईदिल्ली: प्रियंका गांधी को कांग्रेस का महासचिव बनाते हुए राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक ही तीर से तीन शिकार करने की कोशिश की है। इस एक राजनीतिक चाल से जहां कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में भाजपा को कठिन चुनौती में डाल दिया है। वहीं बसपा और सपा को भी अपने गठबंधन में प्रियंका के आने के प्रभाव को नये सिरे से झेलना पड़ेगा। इससे पहले सपा और बसपा के गठबंधन के एलान के बाद अखिलेश ने बाद में भी कांग्रेस को सिर्फ दो सीट देने की बात कही थी। बदलते समीकरणों की वजह से अब माना जा सकता है कि सपा और बसपा भी इस बदली हुई परिस्थिति को भांपकर अपनी रणनीति में तब्दीली करेंगे।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में हाशिये पर पहुंच चुकी कांग्रेस को इस एक ही फैसले से नया जीवन मिला है। राहुल गांधी ने अपनी बहन को पार्टी का महासचिव बनाते हुए उन्हें पूर्वांचल का प्रभारी बनाया है। इससे उत्तर प्रदेश की राजनीति में तेजी से समीकरण बदलने के संकेत मिलने लगे हैं। राजनीति के जानकार मानते हैं कि नेहरु गांधी परिवार के एक सदस्य के कांग्रेस के पक्ष में आते ही प्रदेश के राजनीतिक माहौल में निश्चित रुप से बड़ा बदलाव आयेगा लेकिन पार्टी को इससे कितना फायदा मिलता है, इसका पता आने वाले आम चुनाव के बाद ही लग सकेगा।

पार्टी की घोषणा के मुताबिक प्रियंका गांधी आगामी फरवरी के पहले सप्ताह में अपना कार्यभार संभालेंगी। कांग्रेस अध्यक्ष ने यह फैसला ऐसे समय लिया है जब प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने अप्रैल-मई में होने वाले लोकसभा चुनाव साथ लड़ने का निर्णय लिया है। दोनों दलों ने कांग्रेस को अकेला छोड़ दिया है जबकि कांग्रेस सहित अधिकतर विपक्षी दल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिये महागठबंधन की बात कर रहे हैं।

राजनीति के जानकारों का कहना है कि प्रियंका गांधी को सक्रिय भूमिका देने की लंबे समय से मांग कर रहे कांग्रेस कार्यकर्ताओं में श्री गांधी के इस फैसले से निश्चित रुप से उत्साह और जोश बढ़ेगा और उनकी सक्रियता बढ़ेगी। आज भी प्रियंका की छवि कांग्रेस कार्यकर्ताओं में इंदिरा गांधी की ही तरह है। प्रियंका की राजनीतिक समझ और चुनावी सुझबूझ से लोग पहले से ही वाकिफ हैं क्योंकि पूर्व में भी कई चुनावों में वह रायबरेली और अमेठी में सक्रिय रही हैं। श्री नरेंद्र मोदी तथा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ का चुनाव क्षेत्र इसी हिस्से में हैं। इस तरह प्रियंका गांधी को उन दोनों की चुनौतियों के साथ साथ सपा बसपा का सामना भी करना होगा। कांग्रेस ने राज्य में पिछला विधानसभा चुनाव समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर लड़ा था लेकिन इस गठबंधन को भारी पराजय का सामना करना पड़ा था। उत्तरप्रदेश पर पूरा ध्यान देते हुए राहुल गांधी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रभार सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया को सौंपा है।

लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के प्रदर्शन की बात की जाये तो 1984 के बाद से उसका ग्राफ लगातार नीचे गिरता रहा है। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में हुए आम चुनाव में कांग्रेस ने राज्य की 85 में से 83 सीटें जीती थीं तथा उसे 51 प्रतिशत से अधिक मत मिले थे। उसके बाद से उसकी स्थिति लगातार खराब होती रही है। न केवल उसकी सीटें घटती गयी बल्कि उसे मिलने वाले मतों में भी भारी गिरावट आयी। पांच चुनावों में तो उसकी सीटों की संख्या दो अंकों तक में नहीं पहुंच सकी। पार्टी 1998 के आम चुनाव में राज्य में एक भी सीट नहीं जीत पायी थी। पिछले लोकसभा चुनाव में श्रीमती सोनिया गांधी और श्री राहुल गांधी अपनी सीटें बचा पाने में सफल हुये थे। पिछले तीन दशक में पार्टी को सबसे अधिक 21 सीटें 2009 के लोकसभा चुनाव में मिली थीं जब कांग्रेस केंद्र में लगातार दूसरी बार गठबंधन सरकार बनाने में सफल रही।

प्रियंका के सक्रिय राजनीति में आने से भाजपा की महिला नेत्रियों खासकर स्मृति ईरानी को कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। पूर्व के चुनाव में भी प्रियंका वनाम स्मृति की टक्कर हो चुकी है। लिहाजा अपनी लोकप्रियता और कम बोलने की आदत को कायम रखते हुए प्रियंका उत्तरप्रदेश में कांग्रेस को कितना सक्रिय कर पाती हैं, इस पर जानकारों की नजर अभी से ही लगी हुई है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>