हम भी दरअसल किसी दूसरे ग्रह के मूल निवासी है

  • पृथ्वी ने निगल लिया था कोई प्राणवंत ग्रह

  • इसी चक्कर में उत्पन्न हुआ है चंद्रमा

  • उसी ग्रह का जीवन पृथ्वी पर विकसित हुआ

  • मूल पृथ्वी के माहौल में जीवन संभव नहीं था

  • बाहरी टक्कर ने बदला दिया सारा माहौल

प्रतिनिधि    

नईदिल्लीः हम मानव या यूं कहें कि पूरी जीवित सृष्टि ही इस पृथ्वी पर बाहर से आये हैं। इस पृथ्वी का असली माहौल किसी अन्य शुष्क और ठंडे ग्रह की तरह ही था। किसी बाहरी ग्रह के आ टकराने की वजह से उस ग्रह पर मौजूद जीवन बाद में पृथ्वी पर पनपा और अंततः क्रमिक विकास के दौर में मानव प्रजाति का सृजन हुआ। इसी अनुमान के आधार पर यह भी माना जाता है कि इसी जोरदार टक्कर की वजह से अलग हुआ एक बड़ा टुकड़ा गुरुत्वाकर्षण के बाहर जाकर चंद्रमा की शक्ल ले बैठा। चंद्रमा का मूल स्वरुप वही है जो कभी पृथ्वी का हुआ करता था।

वैज्ञानिकों ने कई आयामों से सारे तथ्यों के विश्लेषण के बाद इस एक संभावना को भी जीवन की उत्पत्ति के तौर पर संभावित आधार माना है। ऐसी सोच रखने वाले वैज्ञानिकों का मानना है कि पहले हमारी धरती भी आज के मंगल ग्रह के जैसी ही थी। इसमें एक बाहरी आवरण सतह था, इसके आंतरिक केंद्र में उबलता हुआ लावा था। लेकिन इसके बीच में अत्यंत अस्थायी माहौल था, जिसमें नाइट्रोजन, कार्बन और गंधक की बहुतायत थी। यह स्थिति किसी भी जीवन के सांस लेने के लिए माहौल बनीं बनाती क्योंकि सांस लेने के लिए जरूरी ऑक्सीजन इसमें नहीं हा है। केंद्र और बाहरी आवरण के बीच स्थित पदार्थ ऊपर नीचे होते रहते थे। यानी पृथ्वी पर इसी क्रम में खनिज उबाल भी आता रहता था। लेकिन इतना कुछ होने के बाद भी पृथ्वी के केंद्र में स्थित तत्व बाहर नहीं आ पाते थे क्योंकि उसकी बाहरी परत अत्यंत कठोर हो चुकी थी।

वैज्ञानिक मानते हैं कि इस स्थिति में बदलाव किसी बाहरी दबाव की वजह से हुआ। यह बाहरी दबाव किसी अन्य ग्रह के टकराने से ही संभव था। इसी वजह से ऐसा माना जा रहा है कि अपने गुरुत्वाकर्षण की वजह से कहीं पृथ्वी ने किसी अन्य ग्रह को निगल तो नहीं लिया था। इसी ग्रह पर जीवन था, जो बाद में यहां पनपता और विकसित होता चला गया।

वैज्ञानिक इस धारणा को प्रतिपादित करने के लिए दो तथ्यों का सहारा लेते हैं। पहला तो पृथ्वी के गर्भ से ऐसे धातुओं और उल्कापिंडों का पाया जाना, जो वास्तव में वैज्ञानिक तौर पर भी पृथ्वी के अंश नहीं रहे हैं। यानी ये किसी बाहरी जगत से पृथ्वी तक आये हैं। इनका एक कारण उल्कापिंडों का टकराना भी हो सकता है। दूसरी स्थिति यह है कि किसी बड़े ग्रह के टकराने की वजह से ही पृथ्वी की रासायनिक परिस्थितियों में बदलाव हुआ।

इस सिद्धांत को आगे बढ़ाने के लिए वैज्ञानिकों ने यह तर्क भी दिया है कि पृथ्वी के अपने और बाहर से आये खंडों में जो असमानता है, उस पर गौर किया जाना चाहिए। पृथ्वी पर मौजूद नाइट्रोजन में कार्बन की मात्रा शून्य है। दूसरी तरफ जो मेटरॉयट यानी कार्बोनस चोंडराइट्स पृथ्वी के काफी गहराई में पाये गये हैं, उनमें एक अंश नाइट्रोजन के साथ 20 हिस्सा कार्बन है। पृथ्वी के आंतरिक संरचना में प्रत्येक अंश नाइट्रोजन में 40 अंश कार्बन पाये गये है। यह किसी बाहरी ग्रह के टकराने से ही संभव है। इस भीषण टक्कर की वजह से पृथ्वी की रासायनिक संरचना में जो तब्दीली हुई, उसे अब भी माना जाता है। शायद इसी टक्कर में शामिल ग्रह पर जीवन था जो टक्कर के बाद पृथ्वी पर पनपता और विकसित होता चला गया।

ह्यूस्टन के राइस विश्वविद्यालय के पृथ्वी और पर्यावरण विज्ञान के शोध कर्ता दमनवीर ग्रेवाल ने अफने शोध प्रबंध में यह नया तथ्य उठाया है। यह सवाल उठाये जाने के बाद इससे जुड़े लोगों ने इस संभावना को आगे बढ़ाने का काम किया है। जिसके तहत समझा जा रहा है कि किसी दूसरे ग्रह के टकराने की वजह से पृथ्वी को प्रचुर मात्रा में सिलिकेट की प्राप्ति हुई। इसी वजह से पृथ्वी पर पहले  से मौजूद तत्वों के अनुपात उल्लेखनीय तरीके से बदल गये। इस शोध से जुड़े वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में इसका एक म़डल बनाकर उसकी परीक्षा भी की है। परीक्षण को अनेक बार किये जाने के क्रम में यह देखा गया कि तत्वों के अनुपात में लगातार बदलाव आता चला गया। इसी वजह से अब इस संभावना पर आगे शोध जारी है कि अगर किसी दूसरे ग्रह से पृथ्वी की टक्कर हुई तो उसका एक हिस्सा चांद बनकर बाहर कैसे चला गया होगा।

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